*डाॅ. शैलजा दुबे
शोध निर्देशिका, प्राध्यापक, समाजशास्त्र एवं सामाजिक कार्य विभाग,
उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल म.प्र.
**समता तिवारी
शोधार्थी, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल म.प्र.

भारत में वैश्वीकरण के पश्चात जहां एक ओर हमने अनेक प्रगतिशील कार्यक्रमांे की ओर अपने कदमों को लय देकर देश का स्थान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी स्थानों में ले जाने में सफलता प्राप्त की है, वहीं दूसरी ओर समाज में वैश्वीकरण के पश्चात सामाजिक विषमताओं एवं विकृतियों ने अनेक अपराधों और अपराधियों को जन्म दिया है। आज किसी भी देश की सामाजिक परिवेश में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों की सूचक जेलों में भी इसी कारण बंदियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। जेलों में बंदियों का एक ऐसा वर्ग भी उभर कर सामने आ रहा है, जिनमें अधिकांश संख्या में उच्च शिक्षित एवं ऐसे बंदी जो अपने शैक्षणिक जीवन काल में विभिन्न अपराधों में लिप्त होकर अथवा सामाजिक कुरीतियों का शिकार होकर जेल प्रवेश हुए और परिणामतः उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है।
बहुधा यह देखने में आया है कि सामाजिक उदासीनता एवं अपराधी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त समाज में जेल से रिहा होकर पहंुचे बंदी को कई बार सामाजिक तिरस्कार का सामना कर पुनः अपराध की ओर मुड़ना पड़ता है।
आज समाज की जेल विभाग से अपेक्षाएं बढ़ी हैं। इन अपेक्षाओं को नैतिक रूप से अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए बंदी सुधार व स्वावलंबन व पुनर्वास हेतु दृढ़ संकल्पित मध्यप्रदेश जेल विभाग द्वारा कुछ पूर्व से प्रचलित विधाओं के प्रशिक्षणों एवं कुछ नवीन व्यावसायिक व सृजनात्मक कला प्रशिक्षण-सह-उद्योग भी प्रारम्भ किए हैं। जिससे बंदियों को वर्तमान परिवेश से बेेहतर रूप में जोड़ा जा सके एवं वह समय के साथ चल सके।

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‘‘म.प्र की जेलों से सृजनात्मक कला प्रशिक्षण’’