डॉ. नरेन्द्र कुमार पाण्डेय

एसोशियट प्रापेफसर, रामलाल आनंद कॉलेज, नई दिल्ली

बिहार प्रांतीय कांग्रेस विधयक दल के नेता के रूप में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को बिहार की सत्ता संरचना के शीर्ष पर आसीन होने का मौका दो विभिन्न अवसरों पर मिला। पहली बार वे 1935 के भारत सरकार अध्नियम के अन्तर्गत हुए चुनावों के बाद 20 जुलाई 1937 को प्रांत के प्रधन मंत्रा के रूप में पदारूढ़ हुए। इस पद पर वे 31 अक्टूबर 1939 तक आसीन रहे। और, दूसरी बार 2 अप्रैल 1946 को उन्होंने पुनः प्रधनमंत्रा का पदभार ग्रहण किया तथा जीवनपर्यन्त 31 जनवरी, 1961 आरूढ़ रहे। कुल मिलाकर वे सोलह वर्षो से उपर बिहार की राजनीति तथा प्रशासन के सिरमौर बने रहे।1 परंतु नौकरशाही पर भी साम्राज्यवादी शक्तियों का ही प्राबल्य था और वह जन सेवा की भावना से कोसों दूर थी। 1946 में उनके सत्तासीन होने के थोड़े समय के अंदर ही भारत स्वतंत्रा हो गया थाऋ लेकिन समस्याएँ तथा चुनौतियाँ सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी थीं और जनता की आशाएँ तथा अपेक्षाएँ सातवें आसमान पर थीं।

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डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, कांग्रेस तथा भारत सरकार अध्नियम 1935 : एक पुनरावलोकन