sandeep kumar

Research scholar , dept of Sanskrit.

Pali & prakriti (KUK)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि |गीता 2,47

किसी ग्रन्थ के प्रयोजन का निर्धारण करते हुए हमें सबसे पहले इस प्रष्न को देखना चाहिए जिसे लेकिन उसकी षुरूवात होती है और उस निश्कर्म को देखना चाहिए जिसे उसकी समाप्ति होती है। गीता एक समस्या अर्जुन के विषाद से प्रारम्भ होती है तथा इसका उपसंहार अर्जुन के कर्मयोगी बनने या यु कहे कि उसके विषाद के निषकरण के साथ होता है। वह युद्ध से निरक्त होने की इच्छा कृश्ण को युद्ध क्षेत्र में करता है । यहां पर अजुर्न की युद्ध विशय विरक्ति को दुर करना हर प्राणी मात्र को जीवन जीने की कला तथा हर समस्या का समाधान भी गीता हमें प्रदान करती है। यह मानव को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा देती है।
गीता का प्रारम्भ द्यृतराश्ट्रके इस कथन से होता है।
‘‘ धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
ममकाः पाण्डवाष्र्चण किमकुर्वत संजय।।’’ गीता 1,1